ईद-उल-अजहा: जब इंसानियत ने कुर्बानी का असली अर्थ समझाया -अजहर इस्लाम

आज का दिन ईद-उल-अजहा का था। चारों ओर त्याग, प्रेम और भाईचारे का पैगाम था। मस्जिदों से तकबीर की सदाएँ गूंज रही थीं, घरों में सेवइयों की महक थी, और हर दिल में खुदा की इबादत का नूर था। पर इसी पावन दिन किस्मत कदमसार पंचायत से एक ऐसी खबर आई जिसने रूह को झकझोर दिया।

दर्द की वह घड़ी आपसी विवाद ने हिंसा का रूप ले लिया। देवेंद्र राजवंशी और प्रार्थना राजवंशी पर निर्ममता से हमला हुआ। हँसुए के वार से देवेंद्र का बायां हाथ लहूलुहान हो गया, और प्रार्थना का हाथ भी तोड़ दिया गया। घायल, सहमे और खून से सने हुए वे दोनों मदद की आस में भागते हुए मेरे द्वार तक पहुंचे। वह दृश्य आंखों के सामने से हटता नहीं। देवेंद्र के हाथ से रक्त की धारा बह रही थी, प्रार्थना का चेहरा पीड़ा से सफेद पड़ गया था। ईद की खुशियों के बीच यह मंजर देखकर कलेजा मुंह को आ गया। वह पल इबादत का था, पर इंसानियत पुकार रही थी।

इंसानियत की अजान बिना एक क्षण गंवाए थाना से संपर्क किया। अपने एक सहयोगी को तुरंत थाना भेजा ताकि समय रहते सहायता मिल सके। थाना प्रशासन ने भी मानवीय संवेदना दिखाई। तत्काल इंजरी बनवाई गई और सभी घायलों को सदर अस्पताल भेजा गया। थाना प्रभारी से वार्ता हुई। उन्होंने विश्वास दिलाया कि इस कुकृत्य में जो भी दोषी होंगे, उन पर कठोरतम कानूनी कार्रवाई होगी और प्राथमिकी दर्ज की जाएगी। 
ईद का सच्चा पैगाम ईद-उल-अजहा हमें हज़रत इब्राहीम अलैहिस्सलाम की कुर्बानी की याद दिलाती है। पर आज समझ आया कि सबसे बड़ी कुर्बानी अपने सुख, अपने त्योहार को भूलकर किसी पीड़ित के आंसू पोंछना है। आज मेरे घर में ईद थी, पर दिल कदमसार के उन घायलों के पास था।

प्रशासन से करबद्ध प्रार्थना है कि इस घटना के दोषियों पर ऐसी सख्त कार्रवाई हो कि फिर कोई हाथ किसी पर उठाने से पहले सौ बार सोचे। समाज में प्रेम, शांति और भाईचारा ही ईद का असली तोहफा है। खून के बदले खून नहीं, मरहम की जरूरत है। दुआ ऐ खुदा, देवेंद्र और प्रार्थना को जल्द सेहत अता फरमा। हमारे गांव, हमारे पाकुड़, हमारे मुल्क में अमन कायम रख। नफरत की आग बुझा दे और दिलों में मोहब्बत की शमा रोशन कर दे। आमीन। क्योंकि ईद सिर्फ गले मिलने का नाम नहीं, टूटे दिलों को जोड़ने का नाम है।
Author: Jharkhand Nama
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