“साहब का ‘खनिज स्वराज’” पत्थर भी है इनका मुख्य आहार

JHN PAK :पाकुड़ जिला यहाँ पत्थर बोलता है, और बालू उड़कर सीधे ‘साहब’ के घर पहुँचती है नो एंट्री में ‘फैमिली एंट्री’ जिले में साहब आए – नाम था “ईमानदार बाबू”। पहले दिन ही बोर्ड टंगवा दिया: “दलालों का प्रवेश वर्जित है” अगले दिन देखा, दफ्तर के बाहर दलाल तो गायब थे, पर अंदर साहब की कुर्सी के ठीक बगल वाली कुर्सी पर उनका ‘छोटका बैठा था। नाम था – “वसूल कुमार”। ईमानदार बाबू ने पूछा: “ये कौन?”चपरासी बोला: “सर, ये दलाल नहीं हैं… ये ‘परिवार’ हैं। इनका ID कार्ड नहीं चलता, इनका ‘ब्लड कार्ड’ चलता है। रात 12 बजे का ‘खनिज महोत्सव’ रात 12 बजे पाकुड़-साहेबगंज रोड पर ट्रकों की रेस लगती। हर ट्रक पर लिखा होता: “जनता हित सर्वोपरी”। पर ड्राइवर को पता था असली हित ‘भतीजा जी’ का है।नाका पर सरकारी वर्दी में खड़ा लड़का पर्ची काटता। नाम पूछो तो कहता: “हम ‘सहायक अधिकारी’ हैं… मतलब साहब के भतीजे के सहायक हैं”। एक ड्राइवर ने गलती से सरकारी रेट पूछ लिया। जवाब मिला: “सरकारी रेट किताब में है, ‘पारिवारिक रेट’ जेब में है। जो जेब वाला देगा, वही आगे जाएगा ‘तकनीकी खराबी’ का जुगाड ईमानदार बाबू ने सीसीटीवी लगवाए। 7 दिन में सारे कैमरे ‘तकनीकी खराबी’ से बंद मिस्त्री बुलाया गया। मिस्त्री निकला साहब का ममेरा साला। बोला: “साहब, कैमरे की नजर लग गई थी। हमने ‘परिवार का कपड़ा’ बांध दिया है, अब सब शुभ होगा” शुभ ये हुआ कि उसके बाद जितने ट्रक निकले, सब सीसीटीवी में ‘अदृश्य’ हो गए। विज्ञान भी परिवार के आगे नत मस्तक अगले हफ्ते ईमानदार बाबू का ट्रांसफर की अफवाहों उड़ गई नई जगह जॉइन करने से पहले वसूल कुमार मिठाई का डब्बा लेकर पहुँचा।बोला: “बुरा न मानना बाबू, आप अच्छे थे पर ‘व्यवस्था’ में फिट नहीं थे। हमारे यहाँ कुर्सी नहीं, ‘वंश’ चलता है”जाते-जाते बोर्ड पर नया नारा पेंट हो चुका था:”न दलाल, न ठेकेदार, अब खनन विभाग है परिवार”पाकुड़ की पहाड़ियाँ आज भी गवाह हैं – पत्थर टूटता है, नदी रोती है, और साहब के घर में हर महीने ‘रॉयल्टी’ का केक कटता है। केक पर लिखा होता है: “जनता हित सर्वोपरी”… बस जनता कौन है, ये परिभाषा परिवार तय करता है
Author: Jharkhand Nama
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